[Private] ए री घन गरजत E Ri Ghan Garajat
ORIGINAL
ए री घन गरजत बरषत दामिनी दमकत स्यामा स्याम जीय भावत ॥ वे देखो चित्र सारी रस भरें पीय प्यारी पोढे सेज दोऊ गावत ॥ कबहु अंक भीर लेत मधुरी तान कबहु अधर मुख चुम चुचावत ॥ 'कृष्ण दास' पूरन आस चातक कीसी नाइ देखि उमडि घुमडि मानों बरषावत ॥२॥