Aanganamen Hari Soy Gayeri
आँगनमें हरि सोय गयेरी
आँगनमें हरि सोय गयेरी ॥ हरे हरे दोऊ जननी मिलिके सेज सहित तब भवन लहेरी ॥१॥ कहत रोहिणी इन्हें न जगावौ खेलत डोलत हार गयेरी...
Raag
Read 32 Pushtimargiya kirtans in Bihag · बिहाग with original Braj Bhasha text and English meanings.
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आँगनमें हरि सोय गयेरी
आँगनमें हरि सोय गयेरी ॥ हरे हरे दोऊ जननी मिलिके सेज सहित तब भवन लहेरी ॥१॥ कहत रोहिणी इन्हें न जगावौ खेलत डोलत हार गयेरी...
नवल किशोर नवल
नवल किशोर नवल मृगनयनी नवल नेह तेरौ लाग रह्यौरी ॥ चल चलरी तोय स्याम बुलावत काहे न करत तू मेरौ कहौ री ॥१॥ सुन राधे एक बात...
मुकुर महलमें मान
मुकुर महलमें मान लिख्यो मोहनीको विनय वचन बोलि सुकुमारीके । कितेक कौतक निहार प्यारी नेन लर स्वेत जरी जोत जानो चित्र चित्...
वे देखो बरत
वे देखो बरत झरोकन दीपक हरि पोढे ऊँची चित्रसारी ॥ सुंदरवदन निहारन कारण राख्योहै बहुत यतन कर प्यारी ॥१॥ कंठलगाय भुजदे सिर...
वे देखो केसी
वे देखो केसी नीकी चित्रसारी तामें पोठे पिय प्यारी दीप मालिका रुचिर बनाई ॥ चहुं ओर झलमलत दीप मोतिन की माल मानो जाल गुहाई...
झरोखन दीपक देखियत
झरोखन दीपक देखियत द्वेहेरी पंगत राजे ॥ घृत परिपूरण सवारी राखे प्यारी कर प्रीतम वदन अवलोकन कारण स्फटिक मणिमय छाजे ॥१॥ दं...
मोहिं भरोसौ श्रीगिरिराज
मोहिं भरोसौ श्रीगिरिराज कौ। कहा जु भयौ तन, मन, धन जो रैं? भक्ति बिना कहा काज कौ? ऊंची मेंडी कौन काज की व्रज वसिबौ भलो छ...
सघन कुंजमें झूलत सखी
सघन कुंजमें झूलत सखी भेषकीयें ॥ कंक भुज डार दोऊ लपटातहीयें ॥१॥ अधर सुधा पीवत दोऊ रंगभीने ॥ उरझत हार दाम नेह नवीने ॥२॥ अ...
झूलत रंग महेल रतन
झूलत रंग महेल रतन हिंडोरें ॥ सखी रूप धरें प्यारी प्यारो बांह जोरें ॥१॥ चुनरी चटक रंग दोऊनके सोहें ॥ हीराके भूषण तन अति...
झूलत मणिमय कनक हिंडोरें
झूलत मणिमय कनक हिंडोरें ॥ पिय प्यारी दोउ रतिरस माने सखी रूप श्याम तन गोरें ॥१॥ तेसोई कुंज चहूंदिश प्रफुल्लित तेसोई पवन...
मणिमंदिरमें झूलत दंपति मणिन
मणिमंदिरमें झूलत दंपति मणिन खचित हिंडोल सुहाये ॥ जगमगात मणि दीपक चहूंदिश तेसेई भूषण अंग बनाये ॥१॥ दोऊ एक वेष करत आलिंगन...
भली करि आये भलि
भली करि आये भलि करी आये पर्व मनायो सलूनो ॥ झुमझुम झुलवत रंगरंगन रस वरखत व्रजदूनो ॥१॥ एकवेष एकरूप एकगुण पूरण नाहिन उनो ॥...
यशुमति सुत पलका
यशुमति सुत पलका पोढावे ॥ अरी मेरो सबदिनको बिछुर्यो यों कहिके मधुर स्वरगावे ॥१॥ पोढ़ो लाल कहूं एक कहानी श्रवणसुनत तुमको ए...
गायो न गोपाल
गायो न गोपाल मनलायो न निवारलाज पायो न प्रसाद साधुमंडली में जायके ॥ धायो न धमक वृंदाविपिनकी कुंजनमें रह्यो न शरण जाय श्र...
निशदिन श्रीवल्लभगुण गायो
निशदिन श्रीवल्लभगुण गायो ॥ भक्तकमल प्रकाशित कर निजजनहि सुधा पिवायो ॥१॥ ज्ञानयोग वैराग्य जपतप अन्य भजन भजाये ॥ ब्रजाधीश...
जय श्रीवल्लभ चरणकमल
जय श्रीवल्लभ चरणकमल शिर नाइये ॥ परमानंद साकार शशि शरदमुख मधुरी बानी भक्तजनन संग गाइये ॥१॥ राजतमछांमध्य सत्त्वके संग ह्व...
मनरे तू भूल्यो
मनरे तू भूल्यो जन्म गमावे ॥ खबर न परी तोको सिरऊपर काल सदा मंडरावे ॥१॥ खानपान अटक्यो निशिवासर जिभ्यालाड लडावे ॥ गृहसुखदे...
बिन गोपाल नहीं कोई अपुनो
बिन गोपाल नहीं कोई अपुनो ॥ कौन पितामाता सुतघरनी यह सब जगत रैनको सपनो ॥१॥ धनकारन निसदिन जग भटकत वृथा जन्म योंही सब खपनों...
सब दिन होत
सब दिन होत न एक समान ॥ प्रगटतहै पूरव की करनी तजमन सोच अज्ञान ॥१॥ कबहुँक राजाहरिश्चंद्र गृहसंपति मेरुसमान ॥ कबहुँक दासश्...
देखो दुर्मति यह संसारकी
देखो दुर्मति यह संसारकी ॥ हरिसो हीराछांडि हाथतें बांधत पोट विकारकी ॥१॥ झूठे सुखमें भूलरहेहैं सुधविसरी करतारकी ॥ नाना वि...
भजन बिन जीवत
भजन बिन जीवत जैसें प्रेत ॥ मनमलीन घरघर प्रति डोलत उदर भरनके हेत ॥१॥ कबहूँ पावत पापको पैसा गाड धूरमें देत ॥ सेवा नहीं गो...
जो रस रसिक
जो रस रसिक कीर मुनि गायो ॥ सो रस रटत रहत निशिवासर शेष सहस्रमुख पार न पायो ॥१॥ गावत शिव शारद मुनि नारद कमलकोश वासी न चखा...
जाके मन बसे
जाके मन बसे स्यामघन माधो ॥ सो सुंदर सोधनीदक्ष सोई सोई कुलीन सोई साधो ॥१॥ सो पंडित सोगुणपुंज सोई जो गोपाल कहिगावे ॥ कोटि...
कमल नयन कमलापति
कमल नयन कमलापति त्रिभुवन के नाथ ॥ एक प्रेमतें सबबने जो मन होवे हाथ ॥१॥ सकल लोककी संपदा ले आगें धरिये ॥ भक्तिविना माने न...
जापर कमलकांत ढरे
जापर कमलकांत ढरै ॥ लकरी घासको बेचनहारो तासिर छत्र-धरै ॥१॥ विद्यानाथ अविद्या समरथ जो कछु चाहे सोई करै ॥ रीतेभरे भरेपुन ढ...
दास अनन्य मेरो
दास अनन्य मेरो निजरूप ॥ दर्शनमात्र ताप त्रय नासत छुडावै गृहबंधन कूप ॥१॥ मेरीबांधी भक्तछुडावें भक्तकी बांधी छुटे न मोही...
हरिरस तबहीं तो
हरिरस तबहीं तो जाय पैये ॥ स्वाद विवाद हर्ष आतुरता इतने दंडजो सहिये ॥१॥ कोमलवचन दीनता सबसों सदां प्रफुल्लित रहिये ॥ गए न...
लगेजो श्रीवृंदावनको रंग
लगेजो श्रीवृंदावनको रंग ॥ मनके मैल सबे छुट जैहे अरु विषयनकों संग ॥१॥ राधावर सेवत अरु सुमरत उपजत लहर तरंग ॥ सखीभाव सहज ह...
जोलों हरि अपुनपो
जोलों हरि अपुनपो न जनावे ॥ तोलों सकलसिद्धान्त मारगको पढ़ें सुनें नहिं आवे ॥१॥ सुनब्रह्मा नारायण मुखतें नारदकूँ सिखदीनी...
रे मन चिंता
रे मन चिंता न कर पेटकी ॥ हलन चलन यामें कछुनाहिन कलम लिखीजो ठेटकी ॥१॥ जीवजंतु जेते जलथलके तिन निधि कहा समेटकी ॥ समे पाए...
तुम तज कौन
तुम तज कौन सनेही कीजे ॥ सदा एकरसको निबहतहै जाकी चरणरज लीजे ॥१॥ यह नहोय अपनी जननीते पिताकरत नहीं ऐसी ॥ बंधुसहोदर सेवन कर...
धनि धनि वृंदावन
धनि धनि वृंदावन के वासी ॥। निशिदिन चरणकमल अनुरागी स्यामास्याम उपासी ॥१॥। अष्टमहासिद्धि द्वारे ठाडी रमाचरणकी दासी ।। या...